MBBS-MD की डिग्री, रूस से पढ़ाई… फिर भी ‘सुकून’ के लिए डॉक्टर ने बसाया अपना अलग गाँव! यहाँ बिजली है न सीमेंट के घर

शांति की तलाश में आधुनिकता का त्याग – ‘भक्ति ग्राम’ की अद्भुत कहानी

परिचय: एक ऐसी दुनिया की कल्पना क्या आप एक ऐसे जीवन की कल्पना कर सकते हैं जहाँ सुबह अलार्म की कर्कश आवाज से नहीं, बल्कि पक्षियों की मीठी चहचहाहट और मंदिर की घंटियों से होती हो? जहाँ दीवारों से सीमेंट की तपन नहीं, बल्कि मिट्टी और गोबर की सोंधी महक आती हो? यह कोरी कल्पना नहीं, बल्कि मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक हकीकत बन चुका है, जिसका नाम है— ‘भक्ति ग्राम’ (Bhakti Gram)

कौन हैं इस पहल के सूत्रधार? इस वैदिक ग्राम की नींव रखने वाले कोई और नहीं, बल्कि एक उच्च शिक्षित डॉक्टर हैं। डॉ. प्रीतेश बहुत्रा, जो नर्मदापुरम के निवासी हैं, ने रूस (Russia) से एमबीबीएस (MBBS) और एमडी (MD) की पढ़ाई पूरी की। वर्षों तक बड़े शहरों में मेडिकल ऑफिसर के रूप में सेवाएं दीं, लेकिन शहर की चकाचौंध और भागदौड़ में उन्हें वह ‘शांति’ नहीं मिली जिसकी उन्हें तलाश थी।

कैसे हुई ‘भक्ति ग्राम’ की शुरुआत? डॉ. बहुत्रा 2021 में भारत लौट आए। अपने सुकून और वैदिक जीवन की चाह में उन्होंने विदिशा जिले की गंजबासौदा तहसील के बड़वासा गाँव में 70 बीघा जमीन खरीदी। धीरे-धीरे उनका पूरा परिवार और उनके जैसे विचारों वाले मित्र यहाँ आकर बसने लगे। आज यह स्थान एक वैदिक कुनबे का रूप ले चुका है, जहाँ जीवन का उद्देश्य ‘पैसा कमाना’ नहीं, बल्कि ‘साधना’ है।

मिट्टी की दीवारें और देसी खपरैल: आर्किटेक्चर जो दे सुकून ‘भक्ति ग्राम’ आधुनिक स्थापत्य कला (Architecture) को एक बड़ी चुनौती देता है:

  • 3 फीट मोटी दीवारें: यहाँ के मकान प्राचीन पद्धति से बने हैं। ईंट, पत्थर, मिट्टी, बांस और लकड़ी का उपयोग किया गया है। दीवारें तीन फीट तक मोटी हैं जो गर्मियों में ठंडक और सर्दियों में गर्माहट देती हैं।
  • देसी खपरैल: छतों पर सीमेंट की जगह देसी खपरैल लगाए गए हैं।
  • गोबर का लेप: घरों को गोबर और मिट्टी से लीपा जाता है, जो वातावरण को शुद्ध रखता है।

बिजली का उपयोग नहीं: गुरुकुल पद्धति से शिक्षा इस गाँव की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यहाँ आधुनिक सुख-सुविधाओं का पूरी तरह त्याग किया गया है:

  • नो इलेक्ट्रिसिटी: यहाँ न टीवी है, न एसी, न कूलर और न ही फ्रिज। लोग बिजली का उपयोग नहीं करते।
  • ईंधन: भोजन पकाने के लिए लकड़ी और उपलों (कंडों) का उपयोग किया जाता है।
  • गुरुकुल शिक्षा: बच्चों को आधुनिक स्कूलों की भीड़-भाड़ से दूर, ‘गुरुकुल आधारित’ वैदिक शिक्षण पद्धति से पढ़ाया जाता है। यहाँ शास्त्रों, संस्कारों और व्यावहारिक जीवन का ज्ञान दिया जाता है।

आत्मनिर्भरता और खेती यह ग्राम पूरी तरह से आत्मनिर्भरता (Self-sustainability) के मॉडल पर काम करता है:

  • यहाँ की 70 बीघा जमीन पर गेहूँ, चना, अरंडी, जीरा, केला, हल्दी, सौंफ, सरसों और मेथी जैसी फसलें उगाई जा रही हैं।
  • खेती पूरी तरह से डॉ. बहुत्रा के अनुसार जीवनयापन और पोषण के लिए की जाती है, न कि केवल व्यापार के लिए।

ब्रह्मचर्य और गृहस्थ का अनूठा संगम भक्ति ग्राम में रहने की व्यवस्था भी वैदिक आश्रमों जैसी है। गृहस्थ परिवारों के लिए अलग कुटीर हैं और ब्रह्मचर्य का पालन करने वाले युवाओं के लिए अलग आवास। वर्तमान में यहाँ लगभग 15 युवा रहते हैं जो इस सात्विक जीवनशैली को अपना चुके हैं।

निष्कर्ष डॉ. प्रीतेश बहुत्रा का यह प्रयोग साबित करता है कि सुख सुविधाओं में नहीं, बल्कि संतोष और प्रकृति के सानिध्य में है। ‘भक्ति ग्राम’ उन लोगों के लिए एक मिसाल है जो मानते हैं कि जीवन का अर्थ केवल कैरियर और पैसा नहीं, बल्कि शांति और आत्म-कल्याण भी है।

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